पहाड़ों का मौन चीत्कार: हिमालयी पारिस्थितिकी, अनियंत्रित निर्माण और प्रकृति का अंतिम अल्टीमेटम
उत्तराखंड और हिमाचल के दुर्गम इलाकों से ग्राउंड जीरो रिपोर्ट
जोशीमठ, उत्तरकाशी और शिमला की वादियों में जब सर्द हवाएं चलती हैं, तो अब उनके साथ देवदार की खुशबू कम और दीवारों में पड़ती दरारों की खामोश दहशत अधिक महसूस होती है। यह किसी एक कस्बे की त्रासदी नहीं है, बल्कि संपूर्ण हिमालयी क्षेत्र में पारिस्थितिक संतुलन के क्षरण की दुखद दास्तान है।
जब पहाड़ जवाब मांगने लगते हैं
भू-वैज्ञानिकों का स्पष्ट मत है कि हिमालय दुनिया की सबसे युवा पर्वत श्रृंखला है, जो आज भी प्रतिवर्ष कुछ मिलीमीटर की दर से ऊपर उठ रही है। ऐसी संवेदनशील टेक्टोनिक प्लेट्स पर भारी विस्फोटकों से सुरंगें खोदना और नदियों के प्राकृतिक प्रवाह को कृत्रिम बांधों में कैद करना विनाश को सीधा आमंत्रण है।
स्थानीय वृद्ध ग्रामीण कहते हैं, "पहाड़ सब कुछ सहते हैं, लेकिन जब उनका सब्र टूटता है तो कोई बांध या कंक्रीट की दीवार उनके वेग को नहीं रोक पाती।" समय आ गया है कि विकास की परिभाषा में पर्यावरण और स्थानीय जनजीवन की सुरक्षा को प्रथम प्राथमिकता दी जाए।
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पाठक टिप्पणियां (2)
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